आखिरी हास्य किताब मैंने पिछले साल अंग्रेज़ी भाषा में Idries Shah द्वारा लिखी गई The Subtleties of Mulla Nasrudin पढ़ी थी। इस बार मैं कुछ अलग अजमाना चाहती थीं, सोचा क्यों न हिंदी भाषा में हास्य में कुछ पढ़ा जाए। इंटरनेट पर खोजा तो लोगों ने हरिशंकर परसाई जी की किताबों को पढ़ने का सुझाव दिया। उनके द्वारा लिखी गई तमाम किताबों में से मुझे निठल्ले की डायरी पढ़ने की उत्सुकता हुई। किताब के शीर्षक को पढ़ते ही मुझे उसे पढ़ने की जिज्ञासा होने लगी।
आपकी समझ में 'निठल्ला' कौन है? एक निठल्ले को आप कैसे परिभाषित करेंगे? जहाँ तक मेरा मानना है, निठल्ला व्यक्ति वह है जो कोई काम-धंधा न करता हो, जो अपने जीवन यापन के लिए कुछ कमाता न हो, या फिर वह जो काम करने योग्य तो है लेकिन उस काम को करने को निरर्थक मानता हो। आपके क्या विचार हैं एक व्यक्ति को निठल्ला होने के लिए, कमेंट बॉक्स में आप अपनी राय साझा कर सकते हैं।
हरिशंकर परसाई जी ने किताब में जिस 'निठल्ले' का चित्ररण किया है वह लगातार कोई काम नहीं करता। उदाहरण के लिए, अगर आप अपने मोबाइल पर लगातार रील्स देख रहे हैं, तो वह भी एक कार्य है। और निठल्ला कुछ ऐसा काम भी नहीं करता जिससे उसका खुद का कोई फ़ायदा हो। मान लो अगर आप लोक निर्माण विभाग में एक बाबू के पद पे कार्य करते हों और सरकार के द्वारा सड़क निर्माण के लिए विभाग में पैसा आये तो आप कुछ पैसे बचाने के लिए सड़क बनवाने में ख़राब माल का इस्तेमाल करे — वह दोनों में से ऐसा कोई कार्य नहीं करता, इसलिए लोग उसे निठल्लेपन की श्रेणी में रखते हैं।
किताब में निठल्ले का मानना था कि कुछ अच्छा काम करो तो वह भगवान की नज़रों में अच्छा नहीं माना जाता, और अगर कुछ अच्छा न करो तो वह अच्छा समझा जाता है। उसने सोचा जब तक इसका निर्णय न हो जाए कि दोनों में से क्या सही है, तब तक कुछ न करना ही ठीक रहेगा। उसने सोचा कि वह अब लोगों के जीवन में दखल देगा लेकिन खुद कोई काम नहीं करेगा। निठल्ले का मानना था कि लोग अपने जीवन में तभी दखल देने देते हैं जब हम उनका कुछ भला करें। तो वह लोगों के जीवन में भला करने की कोशिश में जुट गया।
निठल्ले ने अपनी डायरी में जिन-जिन लोगों के जीवन में दखल देकर भला करने की कोशिश की, वह किताब में प्रस्तुत है। उसने हर एक पात्र के द्वारा समाज में हो रही सच्चाई को व्यंग्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। हर एक अध्याय में अलग-अलग विषय पर चर्चा की गई है और उसके पीछे छिपे अर्थ को सामने लाया गया है।
चाहे वह निठल्ले का शिवशंकर के ट्रांसफर के लिए बड़े साहब के यहाँ सिफ़ारिश करने जाना हो, रामभरोसे के इलाज के लिए उसे अस्पताल में भर्ती करवाना हो, या प्रेमी का अपनी प्रेमिका के सामने प्रेमिका की अम्मा की सेवा करना हो , आयकर विभाग के अधिकारी के लिए व्यापारियों द्वारा कवि सम्मेलन का आयोजन कराना हो—ऐसे ही बहुत से पात्रों द्वारा राजनीति, नेताओं व मंत्रियों, सरकारी विभागों, आज की युवा पीढ़ी, और मध्यम वर्ग पर व्यंग्यात्मक रूप से चर्चा की गई है।
मेरे कुछ पसंदीदा अध्याय: प्रेमी के साथ एक सफ़र, साहब का सम्मान, पहला पुल, पीढ़ियाँ और गिटियाँ, रामसिंह की ट्रेनिंग, विकास कथा, एक गौभक्त से भेंट, भेड़ें और भेड़िये, एक वैष्णव कथा।
निठल्ले की डायरी पढ़कर यह नहीं लगता कि वह किसी निठल्ले द्वारा लिखी गई है। जिस व्यक्ति में इतना बोध और समझ हो, क्या वह भला कहीं निठल्ला हो सकता है?
आख़िर में, निठल्ले का रूपांतरण तो हरिशंकर परसाई जी ने ही किया है। मैं उनकी सराहना करूँगी कि समाज के सच को व्यंग्यात्मक तरीके से सामने लाने के लिए उन्होंने एक निठल्ले को चुना। किताब के शीर्षक को ही उन्होंने व्यंग्यात्मक रूप दिया है। मैंने नहीं सोचा था कि एक किताब को पढ़ते-पढ़ते मैं इतना मुस्कराऊँगी। किताब को छोटे-छोटे अध्यायों और अलग-अलग विषयों में विभाजित किया गया है। आप हर एक दिन एक नया अध्याय पढ़ सकते हैं और अपने आसपास के लोगों को सुना सकते हैं। अगर आप हिंदी में कुछ अच्छा पढ़ने का सोच रहे हैं, तो हरिशंकर परसाई जी की इस किताब को पढ़ सकते हैं।